स्पेस (लघुकथा)
"रजनी भाभी तुम्हारी तो बहुत ठाठ है , जब से बहु आई है,तुम्हारी तो किस्मत ही खुल गई है।" नीरा घर के अंदर घुसते ही बोली।उसकी बात सुनकर वह केवल मुस्कुराई । नीरा उसकी पड़ोसन है, अक्सर किसी न किसी बहाने आती रहती है ,किसी की अच्छाइयां उससे देखी नहीं जाती, इसलिये ज्यादातर परेशान रहती है।उसे मुस्कुराता देख वह फिर बोली।
"कैसे निभाती हो तुम अपनी बहु से जो तुम्हें सर आंखों में रखती है। मैं तो अपनी बहु से एक सेकैंड भी निभा नहीं पाती, सारादिन मुफ्त की रोटी तोड़ती रहती है। मालूम ,इसलिये तो मैं एक सेकैंड खाली रहने नहीं देती हूँ । जितना छूट दोगी उतना ये सर में आकर बैठेगी, मेरी मानों बहु को ज्यादा ढिल देना नहीं चाहिये ।" उसकी बाते सुनकर रजनी को उसकी मानसिकता पर तरस आई।कुछ देर चुप रहने के बाद वह बोली-
"देखों नीरा हमारी बहु स्नेहा न केवल पढ़ी-लिखी है बल्की संस्कारी भी है । शैवाल ने जब स्नेहा को पसंद किया तो मैंने सोच लिया था कि उसके साथ स्पेस रखुंगी जो आमतौर पर नये घर में आकर अनकम्फर्ट महसूस होने लगते हैं। मैंने पहले दिन ही बहु को कह दिया, तुम मेरी बहु नहीं बेटी बनकर रहोगी। उसने भी अपना धर्म निभाते हुए घर और ऑफिस दोनों में तालमेल रखा। और मैंने थोड़ा सा स्पेस देकर सास बहु की रिश्ते को कोमल बनाया ।
ऑफिस जाने से पहले वह सबकुछ करके जाती है और जब वह घर लौटती है तो मैं सास बनकर यह एस्पेक्ट नहीं करती कि बहु आकर हमें चाय बनाके पिलाये। वह चाहती है यह सब करे मगर मैं करने नहीं देती बल्की उसके लिये चाय नाश्ता तैयार करके देती हूँ , इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है? बेटी जब थक कर आती है तो हम उसकी परेशानी समझ कर सबकुछ कर देते है तो बहु को क्यों नहीं ?नीरा आखिर वह भी तो किसी की बेटी है जो सबको छोड़कर हमारे घर आई है । नये घर को अपनाने में समय लगता ही है ।आखिर हमें भी तो उसे एक कम्फोर्ट जॉन देना चाहिये। बस मैं यही करती हूँ।"
पता नहीं नीरा को रजनी की बाते कितनी पल्ले पड़ी , कुछ देर बाद वह चुपचाप वहां से चली गई।
ऋता सिंह सर्जना
तेजपुर असम
"रजनी भाभी तुम्हारी तो बहुत ठाठ है , जब से बहु आई है,तुम्हारी तो किस्मत ही खुल गई है।" नीरा घर के अंदर घुसते ही बोली।उसकी बात सुनकर वह केवल मुस्कुराई । नीरा उसकी पड़ोसन है, अक्सर किसी न किसी बहाने आती रहती है ,किसी की अच्छाइयां उससे देखी नहीं जाती, इसलिये ज्यादातर परेशान रहती है।उसे मुस्कुराता देख वह फिर बोली।
"कैसे निभाती हो तुम अपनी बहु से जो तुम्हें सर आंखों में रखती है। मैं तो अपनी बहु से एक सेकैंड भी निभा नहीं पाती, सारादिन मुफ्त की रोटी तोड़ती रहती है। मालूम ,इसलिये तो मैं एक सेकैंड खाली रहने नहीं देती हूँ । जितना छूट दोगी उतना ये सर में आकर बैठेगी, मेरी मानों बहु को ज्यादा ढिल देना नहीं चाहिये ।" उसकी बाते सुनकर रजनी को उसकी मानसिकता पर तरस आई।कुछ देर चुप रहने के बाद वह बोली-
"देखों नीरा हमारी बहु स्नेहा न केवल पढ़ी-लिखी है बल्की संस्कारी भी है । शैवाल ने जब स्नेहा को पसंद किया तो मैंने सोच लिया था कि उसके साथ स्पेस रखुंगी जो आमतौर पर नये घर में आकर अनकम्फर्ट महसूस होने लगते हैं। मैंने पहले दिन ही बहु को कह दिया, तुम मेरी बहु नहीं बेटी बनकर रहोगी। उसने भी अपना धर्म निभाते हुए घर और ऑफिस दोनों में तालमेल रखा। और मैंने थोड़ा सा स्पेस देकर सास बहु की रिश्ते को कोमल बनाया ।
ऑफिस जाने से पहले वह सबकुछ करके जाती है और जब वह घर लौटती है तो मैं सास बनकर यह एस्पेक्ट नहीं करती कि बहु आकर हमें चाय बनाके पिलाये। वह चाहती है यह सब करे मगर मैं करने नहीं देती बल्की उसके लिये चाय नाश्ता तैयार करके देती हूँ , इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है? बेटी जब थक कर आती है तो हम उसकी परेशानी समझ कर सबकुछ कर देते है तो बहु को क्यों नहीं ?नीरा आखिर वह भी तो किसी की बेटी है जो सबको छोड़कर हमारे घर आई है । नये घर को अपनाने में समय लगता ही है ।आखिर हमें भी तो उसे एक कम्फोर्ट जॉन देना चाहिये। बस मैं यही करती हूँ।"
पता नहीं नीरा को रजनी की बाते कितनी पल्ले पड़ी , कुछ देर बाद वह चुपचाप वहां से चली गई।
ऋता सिंह सर्जना
तेजपुर असम
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