Monday, September 23, 2019

अलविदा (कहानी)

अलविदा (कहानी)

विश्वास नहीं होता, आश्रम की वह अधेड़ स्त्री जिसकी आँखों में चश्मा चढ़ा हुआ था ,बाल कुछ-कुछ जगहों पर सफेदी ने जकड़ राखी थी वह और कोई नहीं सरला ही थी l
मुद्दत बाद मेरी सरला से मुलाक़ात हुई थी l वह दिन भी क्या था जब दोनों एक दुसरे को देखे बिना एक पल भी नहीं रह सकती थी l मगर आज, एक अरसा हो गया हमदोनो को जुदा हुए l
काफी अरसे बाद आज आश्रम के दौरे पर जब मेरी नजर उस अधेड़ स्त्री पर पड़ी तो मैं नजरे न हटा न सकी l मेरे मष्तिष्क जोर दे रहा था, शायद याद कर रहा था कि इस महिला को मैंने कही देखा है l मुझे याद आने लगा l और मैंने उसे पुकार ही लिया l
"सरला"
वह स्त्री ठिठकी l
'सरला मैं नीलू हूँ तुम्हारी सहपाठी l '
उस महिला ने मुझे घुर कर देखा, न कुछ बोली , न मुस्कुराई बस आगे बढ़ गयी l
सरला इतना कठोर मत बनो, तुम भूल गयी अपनी सहेली को , अपनी नीलू को l मैंने तुम्हे कहाँ-कहाँ नहीं ढूढा l तुम्हारा अचानक लापता हो जाना ओह : कितना असहनीय था l
महिला पुन: ठिठकी और धीरे से कहा - "मैं सरला नहीं हूँ l " और आगे बढ़ गई l मैं निराश मन से लौट तो आई मगर उस महिला को भूल न पायी l अतीत के पन्ने मेरी आँखों के सामने एक-एक कर खुलने लगी l स्कूल से कॉलेज ,तक मैंने और सरला ने एक साथ सफ़र तय किया था l वह संभ्रांत घराने की एकलौती बेटी थी और मैं एक साधारण परिवार से सम्बंधित थी l फिर भी दोनों में दोस्ती बहुत मजबूत थी l दोनों एक ही होस्टल में रहा करती थी l कभी-कभी मैं उदास हो जाती उस वक्त जब फ़ीस भुगतान के लिए घर से मनीआर्डर नहीं आ पहुँचता l वह सरला ही तो थी मुझे ढाढस बंधाती और कहती -"मैं किस काम के लिए हूँ l तुम्हारी फ़ीस भर दी गई हैं l "
"सच!!!!!!!!!!"
"हाँ भई हाँ l "
मेरी आँखे छलछला उठती l
यह देख सरला कहती - "यह क्या नीलू तुम रो रही हो ?"
"तुम्हारा प्यार पाकर मैं गदगद हो गई हूँ सरू l नजाने कौन सा जन्म का रिश्ता हैं तुम्हारा और मेरा l " मैं भावुक हो उठती थी l
"अच्छा यह रोना-धोना बंध करो l देखो तुम्हे मजिस्ट्रेट जरुर बनना हैं l मेरा तो क्या हैं एम् .ए करुँगी फिर किसी अच्छे लड़के से शादी करके घर बसाउंगी l मगर तुम्हे मजिस्ट्रेट बनना ही होगा l वह जानती थी मैं बचपन से ही मजिस्ट्रेट बन्ने का सपना देखा करती थी l बाबूजी भी चाहते थे कि मैं कुछ ऐसा काम करू जिससे उनका सीना गर्व से तन जाए l मगर सपना देखना और हकीकत दो अलग -अलग चीज हैं l मुझे मेरे मंजिल पर पौंचाने की वादा करने वाली मेरी प्रिय सहेली सरला एकदिन अचानक मुझे छोड़ कही चली गई l सिरहाने पर एक ख़त छोड़
गई थी l मैं झट से उठी और पत्र पढ़ने लगी l
प्रिय नीलू ,
न चाहते हुए भी मैं आज तुम्हे छोड़कर बहुत दूर जा रही हूँ l जीवन में मिली कठोर आघात मैं सहन नहीं कर पा रही हूँ नीलू, जीवन में सबकुछ होते हुए भी मैं बिलकुल कंगाल हो गई हूँ l मेरी एक भूल के कारण मैं किसी को मुंह दिखाने की काबिल न रही l उस कमीना रमेश के झूठे प्रेमजाल में फंसकर आज मैं कही की न रही l नीलू मैं जा रही हूँ मगर तुम्हे अपनी मंजिल अवश्य ही पहुँचाना हैं l अपने नाम के बैंक में जमा रूपये सब तुम्हारे नाम ऑथोरिटी देकर जा रही हूँ l जिससे तुम अपनी पढ़ाई पूरी करोगी l
तुम्हारी
अपनी सरला
एक सांस में पत्र समाप्त किया मैंने l फिर तुरंत उठकर सरला के घर पर टेलीफोन डायल किया मैंने l काफी समय बाद एक महिला की आवाज आई l
"हेल्लो ! मिसेस वर्मा हियर l
"हेल्लो आंटी ! मैं नीलू बोल रही हूँ होस्टल से l "
"नीलू ! तुम इतनी घबराई हुई क्यों हो ?सब तो ठीक हैं न ?"
"आंटी ...........सरला घर तो नहीं आई हैं?"
"नहीं तो ! क्या बात हैं ?"
"आंटी ................सरला बिन बताये नजाने कहाँ चली गयी हैं l कल रात वह कब उठकर चली गयी पता नहीं चला l
होस्टल में हलचल मच गयी l सरला गई कहाँ ? टी.वी ./रेडिओ /अखबार सब जगह लौट आने का इस्तहार दिया गया l हर कोशिश नाकामयाब रही l धीरे-धीरे वाट करवट बदलने लगा l परीक्षा सामने थी l मैं पढ़ाई में जुट गई l क्योंकि मेरा अब लक्ष्य एक ही था की जैसे हो मुझे कम्पीटीशन में सफल होना ही है l कम्पटीशन में मैं अव्वल नंबर से पास हुई l और आज मैं एक मजिस्ट्रेट हूँ l
"मेमसाहब साहब टूर से आ गयें हैं l "
"कहाँ है साहब?"
"लाइब्रेरी में l "
"अच्छा तुम चाय बनाओं l " कहती हुई मैं लाइब्रेरी की ओर मुखातिब हुई l जब भी मैं दौरे पर जाती हूँ l
सिद्धांत लाइब्रेरी में घुस जाता है l लाइब्रेरी में मैंने जैसे ही कदम रखा सिद्धांत बोल उठा l
"दौरा कैसा रहा ?"
"ठीक ही था l मगर सिद्धांत, मैं वहां से लौटकर एक सवाल से उभर नहीं पायी हूँ l सिद्धांत मुझे प्रश्न सूचक नजरों से देखने लगा l चाय तैयार थी हम बैठक खाने मे आ गये l
" कौन सा सवाल नीलू ?" चाय की चुश्की लेता हुआ सिद्धांत ने पूछा l
" आज आश्रम में मैंने एक ऐसी महिला को देखा जिसकी शक्ल सरला से हुबहु मिलती है l
" तो इसमें परेशान होने की क्या बात है l इंसान की शक्ल में थोड़ी मेल तो रहता है l "
"मगर वह सरला ही थी l मैंने उसे पुकारा था l वह रुकी थी मगर मै सरला नहीं हूँ कहती हुई आगे बड़ गयी l "
सिद्धांत कुछ पल सोच में डूब गया l बोला - अगर वह सरला थी तो तुमसे क्यों बात नहीं की ? क्या कोई मजबुरी होगी ?
क्या मजबुरी हो सकती है मै मन ही मन सोचने लगी l मै उस महिला से एकबार फिर मिलूंगी मैंने मन ही मन ठान लिया और सिद्धांत से बोल उठी - सिद्धांत कल मेरे साथ आश्रम चलोगे ?
" ठीक है l " सिद्धांत ने मेरे परेशानी को को भांपकर कहा l
सुबह तक की प्रतीक्षा मुझे बहुत कठिन लगने लगा और आखिर प्रतीक्षा की घड़ी भी समाप्त हो गई l मै और सिद्धांत आश्रम के लिए रवाना हो गए l आश्रम के बाहर भीड़ जमा थी l मेरा दिल धक्क से रह गया l हम आश्रम के समीप पहुँच गए l जमीन पर किसी की लाश पड़ी थी l मुझे देख आश्रम का संचालक हाथ जोड़ते हुए सामने आया l
"क्या बात हैं मिस्टर सान्याल ? यह किसकी लाश हैं ? यह कैसे हुआ?"
"नींद की गोली खाने से हुई हैं मैडम l बेचारी कल ही तो यहाँ आई थी l "
"कल ! कहाँ से ?"
"पता नहीं l "
मैं करीब पहुँच चुकी थी l जैसे ही मैं उस लाश के समीप पहुंची तो सन्न रह गई l वह कल की अधेड़ महिला थी l मैं चीख उठी "सरला"!!!!!!!!!!
सिद्धांत मुझे सहारे दिए हुए था l लाश ले जा चूका था l मगर मेरी आँखों से अश्रुधारा अभी भी बह रही थी l मिस्टर सान्याल के थमाए एक छोटी सी नोट अब भी मेरे हाथो में कैद था l मैं वह नोट पढ़ने लगी -
नीलू ,
"तुम्हारी सफलता पर मुझे नाज हैं l तुम अपनी लक्ष्य पर खरी उतरी हो यह जानकार मैं बेहद खुश हूँ l मगर मैं दिन-ब-दिन गन्दगी के दलदल में ऐसे फसती चली गयी की जहाँ से उभारना आमुम्किन हैं l इसलिए मैं आज हमेशा के लिए इस दुनिया से जा रही हूँ l बस एक गुजारिश हैं तुमसे , 'आश्रय' अनाथ आश्रम में मेरी बेटी रानी रहती हैं जिसे मैं कभी भी माँ का प्यार दे न सकी l हो सके तो उसे गोद ले लेना नीलू l
अलविदा सखी अलविदा
सरला
सरला ये तुमने क्या किया, अपनी सहेली को इस काबिल बनाकर खुद हमेशा के लिए इस दुनिया से चली गई l मेरा अंतर्मन करह उठा l काश एक बार तुमने मुझे खुलकल रमेश के बारे में बताई होती !
मुझे अब भी सिद्धांत सहारा दिए हुए था l और मैं उसी प्रकार रो रही थी l सिद्धांत ने धीरे से मेरे सर पर हाथ फेरा और कहा -
"नीलू आओ चले 'आश्रय 'l " सिद्धांत ने भी वह नोट पढ़ ली थी l
हमदोनो ने रानी को गोद ले लिया हैं l रानी भी हम से घुल-मिल गयी हैं l जैसे लगता हैं रानी के रूप में सरला एकबार फिर पुनर्जीवित होकर मेरे पास आ गयी हो l
रीता सिंह सर्जना

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